विकास के वादों के बीच छिपा स्वार्थ का सच — क्या शहर फिर बनेगा राजनीति का शिकार?
हरिहरनाथ त्रिवेदी
प्रधान संपादक

Dhanbad में नगर निकाय चुनाव की सरगर्मियाँ तेज हो चुकी हैं। चौक-चौराहों पर रंगीन पोस्टरों की भीड़ है, दीवारों पर विकास के दावे लिखे हैं, और मंचों से परिवर्तन के नारे गूंज रहे हैं। हर प्रत्याशी स्वयं को जनता का सच्चा सेवक बता रहा है। किंतु इस चमक-दमक और घोषणाओं के शोर के बीच एक गंभीर प्रश्न सिर उठाता है—क्या यह चुनाव सचमुच जनसेवा की भावना से लड़ा जा रहा है, या फिर सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण पाने की होड़ है?
नगर निकाय लोकतंत्र की सबसे निचली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यही वह मंच है जहाँ से शहर की बुनियादी समस्याओं का समाधान निकलता है—सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, सड़क निर्माण, नाली व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सार्वजनिक स्थलों का रख-रखाव। परंतु दुर्भाग्य से, इन मूल मुद्दों की चर्चा कम और व्यक्तिगत प्रचार अधिक दिखाई दे रहा है।
चुनावी सभाओं में विकास के बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। कोई कहता है कि वह हर वार्ड को मॉडल वार्ड बना देगा, कोई दावा करता है कि शहर को महानगरों की श्रेणी में ला खड़ा करेगा। लेकिन जनता यह भी पूछ रही है—पिछले कार्यकालों में जो प्रतिनिधि थे, उन्होंने क्या किया? क्या शहर की टूटी सड़कों की मरम्मत हुई? क्या जलजमाव की समस्या का स्थायी समाधान निकला? क्या कचरा प्रबंधन व्यवस्था सुधरी?
सच यह है कि चुनावी मौसम में सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। जिन गलियों में वर्षों तक कोई प्रतिनिधि नहीं पहुँचा, वहाँ आज हाथ जोड़कर वोट मांगे जा रहे हैं। यह परिवर्तन यदि स्थायी होता तो शहर की तस्वीर कुछ और होती। परंतु आशंका यही है कि कहीं यह सक्रियता केवल मतदान तक सीमित न रह जाए।
एक और चिंताजनक पहलू है—धनबल और प्रभाव का बढ़ता उपयोग। चुनाव में बढ़ता खर्च यह संकेत देता है कि कुछ लोगों के लिए यह जनसेवा नहीं, बल्कि निवेश है। यदि राजनीति निवेश बन जाएगी, तो स्वाभाविक है कि उससे लाभ की अपेक्षा भी की जाएगी। यही वह मानसिकता है जो भ्रष्टाचार की जड़ बनती है। नगर निकाय जैसी स्थानीय संस्था में यदि पारदर्शिता और ईमानदारी का अभाव होगा, तो उसका सीधा असर आम नागरिक के जीवन पर पड़ेगा।
धनबाद एक औद्योगिक और खनन क्षेत्र के रूप में अपनी विशेष पहचान रखता है। यहाँ विकास की संभावनाएँ भी हैं और चुनौतियाँ भी। प्रदूषण, अव्यवस्थित यातायात, जल निकासी की समस्या और स्वच्छता की चुनौतियाँ शहर के सामने खड़ी हैं। ऐसे में हमें ऐसे प्रतिनिधियों की आवश्यकता है जो दूरदर्शी हों, जो योजनाओं को धरातल पर उतारने की क्षमता रखते हों, और जिनकी प्राथमिकता निजी स्वार्थ नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित हो।
लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। मतदाताओं को यह समझना होगा कि उनका वोट पाँच वर्षों की दिशा तय करता है। यदि वे तात्कालिक प्रलोभनों के प्रभाव में निर्णय लेते हैं, तो उसका खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ता है।
यह चुनाव केवल चेहरों का चयन नहीं, बल्कि चरित्र की परीक्षा है। प्रत्याशियों को भी आत्ममंथन करना चाहिए—क्या वे वास्तव में सेवा के लिए आगे आए हैं, या केवल पद और प्रतिष्ठा के लिए? नगर निकाय का पद सम्मान का प्रतीक अवश्य है, पर उससे बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
धनबाद की जागरूक जनता यदि विवेकपूर्ण निर्णय लेती है, तो यह चुनाव शहर के भविष्य को नई दिशा दे सकता है। अन्यथा, यह अवसर भी केवल वादों और नारों की भीड़ में खो जाएगा।
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