हरिहर नाथ त्रिवेदी
सम्पादक

लोकतंत्र में चुनाव केवल पद पाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा का अवसर माना जाता है। फिर भी जब मेयर और पार्षद के चुनाव आते हैं, तो ऐसा लगता है मानो हर गली-मोहल्ले से एक नया दावेदार तैयार खड़ा है। आखिर ऐसा क्या है इन पदों में कि लोग इन्हें पाने के लिए इतने उत्सुक दिखाई देते हैं?

सबसे पहले समझना होगा कि मेयर और पार्षद केवल नाम के पद नहीं हैं। नगर निगम या नगर परिषद की बागडोर इन्हीं के हाथ में होती है। शहर की सड़कों से लेकर नालियों तक, पानी की व्यवस्था से लेकर सफाई और स्ट्रीट लाइट तक—हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान इन्हीं के माध्यम से होता है। मेयर शहर का प्रथम नागरिक कहलाता है और पार्षद अपने-अपने वार्ड का प्रतिनिधि। यानी जनता से सीधा संपर्क और सीधी जिम्मेदारी।

लेकिन यह उत्साह केवल सेवा भावना से प्रेरित है, ऐसा मान लेना भी सरलता होगी। इन पदों के साथ प्रभाव, पहचान और राजनीतिक शक्ति भी जुड़ी होती है। नगर स्तर की राजनीति कई बार बड़े राजनीतिक मंचों की सीढ़ी बन जाती है। आज का पार्षद कल विधायक या सांसद बनने का सपना देखता है। स्थानीय स्तर पर लोकप्रियता, समर्थकों का आधार और प्रशासन पर प्रभाव—ये सब आगे की राजनीति के लिए मजबूत जमीन तैयार करते हैं।

दूसरा कारण है संसाधनों पर नियंत्रण। विकास योजनाओं, ठेकों, बजट और परियोजनाओं में मेयर और पार्षद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जहां संसाधन हैं, वहां आकर्षण भी स्वाभाविक है। यही कारण है कि चुनाव के समय वादों की बाढ़ आ जाती है—हर उम्मीदवार अपने वार्ड या शहर को “स्मार्ट” और “आदर्श” बनाने का दावा करता है।

परंतु इस होड़ का एक सकारात्मक पक्ष भी है। लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा ही बेहतर विकल्प सामने लाती है। जब अधिक लोग चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो जनता के पास चुनने के लिए विकल्प बढ़ते हैं। योग्य और ईमानदार उम्मीदवार भी इसी प्रतिस्पर्धा से उभरते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब चुनाव केवल व्यक्तिगत लाभ या प्रतिष्ठा की लड़ाई बनकर रह जाए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता केवल नारों और जातीय-दलगत समीकरणों से प्रभावित न हों, बल्कि उम्मीदवार की कार्यक्षमता, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता को परखें। मेयर और पार्षद का पद शहर की दिशा तय करता है। यदि सही व्यक्ति चुना जाए, तो शहर का भविष्य बदल सकता है; और यदि गलत चयन हो, तो विकास वर्षों पीछे चला जाता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि लोग चुनाव लड़ने को उत्सुक क्यों हैं; प्रश्न यह है कि उनमें से कौन वास्तव में जनता की सेवा के लिए तत्पर है। लोकतंत्र की असली शक्ति मतदाता के विवेक में निहित है। जब नागरिक जागरूक होंगे, तभी मेयर और पार्षद का चुनाव सत्ता की लालसा नहीं, सेवा की साधना बनेगा।

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